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शनिवार, २३ मई २००९

अख़ग़र पानीपती की ग़ज़ल

जिस को भी देखिये तन्हा क्यों है
आज का प्यार दिखावा क्यों है

फूल खिलते हैं तो मुरझाने को
तिरी दुनिया में ये होता क्यों है

इस पे भी अहलेनज़र गौर करें
फूल किरदार में कांटा क्यों है

याद आती है तो आती क्यों है
दर्द उठता है तो उठता क्यों है

ये गौहर दिल का है अन्मोल गौहर
मुफ्त में फिर भी ये बिकता क्यों है

मुझसे बढ़ कर नहीं अच्छा कोई
सब को इस बात का दावा क्यों है

मुझको अक्सर ये ख्याल आता है
वो समुंदर है तो प्यासा क्यों है

उस को ये भी है शिकायत मुझ से
'अख़ग़र' अच्छा है तो इतना क्यों है

2 टिप्पणियाँ:

भूतनाथ ने कहा…

अद्भुत बढ़िया भाई....अभी तो इससे ज्यादा शब्द नहीं मेरे पास...!!

राजीव तनेजा ने कहा…

बहुत ही उम्दा रचना